More
    HomeHindi NewsEntertainmentअशोक कुमार: ‘महल’ से ‘चलती का नाम गाड़ी’ तक, नायक से चरित्र...

    अशोक कुमार: ‘महल’ से ‘चलती का नाम गाड़ी’ तक, नायक से चरित्र अभिनेता बने, 76वें जन्मदिन पर आई थी ये बुरी खबर

    हिंदी सिनेमा के पहले एंटी-हीरो, ‘दादामुनि’ के 76वें जन्मदिन पर मिली थी छोटे भाई किशोर कुमार के निधन की खबर

    हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हुए, जिन्होंने अभिनय की परिभाषा बदल दी। अशोक कुमार उन्हीं में से एक थे। पर्दे पर कभी रोमांटिक हीरो बनकर दर्शकों का दिल जीतने वाले अशोक कुमार ने बाद में ऐसे किरदार भी निभाए, जिन्हें उस दौर में नायक के रूप में देखना आसान नहीं था। साल 1943 में आई फिल्म ‘किस्मत’ में उनका एंटी-हीरो वाला अंदाज हिंदी सिनेमा के लिए एक नई शुरुआत साबित हुआ। अपनी सहज अदाकारी, बहुमुखी प्रतिभा और सादगी के कारण वह ‘दादामुनि’ के नाम से मशहूर हुए। हालांकि, उनकी जिंदगी में एक ऐसा दिन भी आया, जब जन्मदिन की खुशियां छोटे भाई किशोर कुमार के निधन की खबर से मातम में बदल गईं। इसके बाद उन्होंने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया।

    13 अक्टूबर 1911 को भागलपुर में जन्मे अशोक कुमार की 115वीं जयंती पर उनके जीवन के उन पहलुओं को याद करना जरूरी है, जिन्होंने उन्हें हिंदी सिनेमा का एक खास सितारा बनाया।

    कुमुदलाल गांगुली से ऐसे बने अशोक कुमार

    अशोक कुमार का असली नाम कुमुदलाल गांगुली था। उनके पिता कुंजीलाल गांगुली वकील थे और चाहते थे कि बेटा भी कानून की पढ़ाई करके इसी पेशे में आगे बढ़े। लेकिन अशोक कुमार का मन पढ़ाई में नहीं लगा। कानून की पढ़ाई के दौरान असफल होने के बाद वह मुंबई में अपनी बड़ी बहन के घर चले गए।

    उनके बहनोई शशधर मुखर्जी उस समय बॉम्बे टॉकीज से जुड़े हुए थे। उनकी मदद से अशोक कुमार को फिल्म स्टूडियो की प्रयोगशाला में सहायक की नौकरी मिल गई। उस समय उन्हें करीब 75 रुपये महीने मिलते थे। फिल्मों में अभिनय करना उनकी पहली पसंद नहीं थी, लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।

    बॉम्बे टॉकीज के संस्थापक हिमांशु राय ने उन्हें फिल्म ‘जीवन नैया’ में मुख्य भूमिका का मौका दिया। 1936 में आई इस फिल्म से अशोक कुमार ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। इसी साल देविका रानी के साथ उनकी फिल्म ‘अछूत कन्या’ भी रिलीज हुई, जिसने उन्हें पहचान दिलाई। इस तरह पर्दे के पीछे काम करने वाला एक युवा कलाकार देखते ही देखते हिंदी सिनेमा का लोकप्रिय चेहरा बन गया।

    ‘किस्मत’ में निभाया एंटी-हीरो का किरदार

    अशोक कुमार ने अपने करियर की शुरुआत पारंपरिक नायक की भूमिकाओं से की थी। उस दौर में हिंदी फिल्मों के हीरो को आमतौर पर आदर्शवादी, ईमानदार और नैतिक मूल्यों पर चलने वाले व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता था। लेकिन 1943 में आई फिल्म ‘किस्मत’ ने इस धारणा को चुनौती दी।

    ज्ञान मुखर्जी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अशोक कुमार ने एक ऐसे किरदार को पर्दे पर उतारा, जो परंपरागत अर्थों में आदर्श नायक नहीं था। फिल्म में उनका चरित्र जेबकतरी और अपराध की दुनिया से जुड़ा था, लेकिन उसके भीतर भावनाएं और मानवीय संवेदनाएं भी थीं। यही वजह थी कि दर्शकों ने इस किरदार को पसंद किया।

    ‘किस्मत’ को हिंदी सिनेमा की शुरुआती बड़ी व्यावसायिक सफलताओं में गिना जाता है। इस फिल्म ने यह भी दिखाया कि दर्शक केवल सीधे-सादे नायक को ही पसंद नहीं करते, बल्कि जटिल और खामियों वाले किरदार भी उन्हें आकर्षित कर सकते हैं। अशोक कुमार ने अपने अभिनय से इस बदलाव को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई।

    ‘महल’ से ‘चलती का नाम गाड़ी’ तक दिखाई बहुमुखी प्रतिभा

    अशोक कुमार का फिल्मी सफर किसी एक तरह की भूमिका तक सीमित नहीं रहा। फिल्म ‘महल’ में उनके अभिनय ने रहस्य और रोमांच से भरपूर कहानी को अलग पहचान दी। वहीं ‘चलती का नाम गाड़ी’ में उनकी हास्य प्रतिभा सामने आई। किशोर कुमार और अनूप कुमार के साथ उनकी मौजूदगी ने इस फिल्म को यादगार बना दिया। इसके अलावा ‘बंधन’, ‘झूला’, ‘परिणीता’, ‘गुमराह’, ‘ममता’, ‘ज्वेल थीफ’, ‘खूबसूरत’ और ‘खट्टा मीठा’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने नायक की भूमिकाओं से आगे बढ़कर चरित्र अभिनेता के रूप में भी अपनी मजबूत जगह बनाई।

    फिल्म ‘आशीर्वाद’ में उनके अभिनय को खास तौर पर सराहा गया। इस फिल्म में उन्होंने भावनाओं से भरे किरदार को जिस सहजता से निभाया, वह उनकी अभिनय क्षमता का उदाहरण बना। अभिनय के अलावा अशोक कुमार को गायन, चित्रकारी, होम्योपैथी और ज्योतिष में भी दिलचस्पी थी।

    जब 76वें जन्मदिन पर टूट गया खुशियों का संसार

    अशोक कुमार की जिंदगी का सबसे भावुक अध्याय 13 अक्टूबर 1987 से जुड़ा है। उस दिन वह अपना 76वां जन्मदिन मना रहे थे। उनके सम्मान में भव्य आयोजन किया गया था। फिल्म जगत के लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं दीं और उनके घर पर मेहमानों का आना-जाना लगा रहा।

    लेकिन इस खुशी के बीच उनकी निगाहें अपने छोटे भाई किशोर कुमार का इंतजार कर रही थीं। किशोर कुमार हिंदी सिनेमा के महान गायक और अभिनेता थे। दोनों भाइयों के बीच गहरा लगाव था। इसी दौरान अशोक कुमार को खबर मिली कि किशोर कुमार का निधन हो गया है। वह केवल 58 वर्ष के थे।

    जिस दिन बड़े भाई के जन्मदिन की खुशियां मनाई जा रही थीं, उसी दिन छोटे भाई के दुनिया छोड़ने की खबर ने सब कुछ बदल दिया। बताया जाता है कि अंतिम संस्कार के समय अशोक कुमार ने दुखी होकर कहा था, “वो बचपन से मजाकिया था, पर यह कैसा मजाक है?”

    यह घटना उन्हें भीतर तक तोड़ गई। किशोर कुमार की मौत के बाद अशोक कुमार ने अपना जन्मदिन मनाना बंद कर दिया। उनके लिए 13 अक्टूबर केवल जन्मदिन की तारीख नहीं रहा, बल्कि छोटे भाई की याद और उससे जुड़े दर्द का दिन बन गया।

    पुरस्कारों से सम्मानित हुआ लंबा फिल्मी सफर

    अशोक कुमार के योगदान को भारतीय सिनेमा में व्यापक सम्मान मिला। उन्हें 1959 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1962 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। साल 1988 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मानों में शामिल दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला। वर्ष 1999 में उन्हें पद्म भूषण से भी नवाजा गया।

    ‘राखी’ और ‘आशीर्वाद’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिले। ‘आशीर्वाद’ में उनके अभिनय को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। ये पुरस्कार उनके लंबे और विविधतापूर्ण करियर की पहचान बने।

    10 दिसंबर 2001 को 90 वर्ष की उम्र में अशोक कुमार का निधन हो गया। वह अपने पीछे फिल्मों की ऐसी विरासत छोड़ गए, जिसमें रोमांस, कॉमेडी, रहस्य और गंभीर अभिनय के कई यादगार उदाहरण शामिल हैं। दादामुनि ने साबित किया कि एक कलाकार की पहचान सिर्फ उसके निभाए किरदारों से नहीं, बल्कि उन बदलावों से भी बनती है, जिन्हें वह अपने काम के जरिए सिनेमा में लाता है।

    RELATED ARTICLES

    Most Popular

    Recent Comments