छत्तीसगढ़ में एक पदनाम को लेकर ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक और कानूनी हलकों का ध्यान खींचा है। मामला ‘राष्ट्रपति’ कहे जाने वाले एक पदाधिकारी से जुड़ा है, जिनके पद की वास्तविक स्थिति और अधिकारों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अब यह प्रकरण गृह मंत्रालय तक पहुंच गया है और आगे के फैसले पर निगाहें टिकी हैं।
मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि शीर्षक में जिस विरोधाभास की ओर इशारा किया गया है—‘राष्ट्रपति’ नहीं हैं, लेकिन राष्ट्रपति हैं—उसका संबंध पदनाम, आधिकारिक मान्यता और उसके इस्तेमाल से जुड़ा हो सकता है। हालांकि, उपलब्ध स्वतंत्र स्रोतों से अभी इस मामले के सभी तथ्य और संबंधित व्यक्ति की पहचान की पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक निर्णय और संबंधित दस्तावेजों को देखना जरूरी होगा।
घुटरा गांव के निवासी का नाम ‘राष्ट्रपति’
यह मामला छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के घुटरा गांव का है। यहां एक ग्रामीण का नाम सरकारी दस्तावेजों में ‘राष्ट्रपति’ दर्ज है। यह नाम किसी संवैधानिक पद पर आसीन होने की वजह से नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत पहचान के रूप में दर्ज है।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्राथमिक स्कूल के दाखिला रजिस्टर में 14 जुलाई 1988 को उनका नाम ‘राष्ट्रपति’ लिखा गया था। स्कूल के प्रधानपाठक अनिल राय ने बताया कि विद्यालय के रिकॉर्ड में यही नाम दर्ज है और नाम लिखने में किसी गलती की जानकारी सामने नहीं आई है। संबंधित व्यक्ति की शैक्षणिक अंकसूची और बैंक पासबुक में भी यही नाम दर्ज है। इस तरह देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का नाम एक ग्रामीण की निजी पहचान बन गया है। यही स्थिति इस मामले को चर्चा में ला रही है।
कांग्रेस नेता ने उठाया संवैधानिक शब्दों के इस्तेमाल का मुद्दा
ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सौरव मिश्रा ने इस मामले को लेकर राष्ट्रपति सचिवालय में याचिका दाखिल की है। उन्होंने मांग की है कि ‘राष्ट्रपति’, ‘प्रधानमंत्री’, ‘मुख्यमंत्री’, ‘राज्यपाल’ और ‘भारत’ जैसे संवैधानिक एवं राष्ट्रीय महत्व वाले शब्दों को व्यक्तिगत नाम के रूप में इस्तेमाल करने के संबंध में स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
याचिका में मौजूदा कानूनी व्यवस्था की समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर नया विधेयक या उपयुक्त कानूनी प्रावधान तैयार करने का आग्रह भी किया गया है। याचिकाकर्ता का उद्देश्य ऐसे मामलों में भविष्य में भ्रम और असमंजस की स्थिति से बचने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय कराना है।
राष्ट्रपति सचिवालय से गृह मंत्रालय तक पहुंचा मामला
इस प्रकरण में राष्ट्रपति सचिवालय ने याचिका को संबंधित मंत्रालयों और विभागों के पास आवश्यक कार्रवाई के लिए भेज दिया है। अब गृह मंत्रालय की प्रतिक्रिया और इस मांग पर होने वाला विचार महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, किसी याचिका को संबंधित विभागों के पास भेजे जाने का मतलब यह नहीं है कि उसमें की गई मांग स्वीकार कर ली गई है। फिलहाल इस मामले में नया कानून बनाने या किसी मौजूदा नियम में बदलाव को मंजूरी मिलने की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
क्या बदलेंगे नाम रखने के नियम?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार संवैधानिक पदों और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े शब्दों को व्यक्तिगत नाम के रूप में इस्तेमाल करने पर कोई स्पष्ट नीति बनाएगी। यदि इस विषय पर विचार होता है, तो कानूनी विशेषज्ञों की राय और मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा अहम होगी।
फिलहाल घुटरा गांव के इस अनोखे मामले में अंतिम फैसला आना बाकी है। गृह मंत्रालय और संबंधित विभागों की ओर से क्या कदम उठाया जाता है, इस पर आगे की स्थिति निर्भर करेगी।


