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2029 में मिल सकता है महिला आरक्षण, अधिसूचना जारी होने के समझें मायने

शुक्रवार (17 अप्रैल, 2026) को लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन विधेयक भले ही गिर गया हो, लेकिन राजनीति के गलियारों में यह चर्चा तेज है कि 2029 के चुनावों में महिला आरक्षण की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। सरकार द्वारा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संशोधन, 2023) को आनन-फानन में नोटिफाई करने के पीछे गहरी रणनीतिक वजहें मानी जा रही हैं।

विधेयक गिरने के बावजूद उम्मीद क्यों?

भले ही नया संशोधन (जो सीटों को 850 करने और आरक्षण को फास्ट-ट्रैक करने के लिए था) पास नहीं हो पाया, लेकिन मूल कानून ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ अभी भी जीवित है।

  • अधिसूचना (Notification): सरकार ने वोटिंग से ठीक पहले 16 अप्रैल, 2026 को 2023 वाले कानून को प्रभावी बनाने के लिए अधिसूचना जारी कर दी थी।
  • कानूनी स्थिति: इसका मतलब है कि अब महिला आरक्षण भारत के संविधान का हिस्सा बन चुका है। भले ही इसे लागू करने की प्रक्रिया (परिसीमन) पर विवाद हो, लेकिन कानून को रद्द नहीं किया गया है।

2029 का गणित और सरकार की रणनीति

सरकार ने जो विधेयक पेश किया था, उसका मुख्य उद्देश्य आरक्षण को 2029 में ही लागू करना था, जिसके लिए वह जनगणना और परिसीमन की शर्तों को बदलना चाहती थी।

  1. विपक्ष का पेंच: विपक्ष आरक्षण के खिलाफ नहीं था, लेकिन वह इसे परिसीमन (Delimitation) से जोड़ने के खिलाफ था। उनका तर्क है कि इससे दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटें कम हो जाएंगी।
  2. नोटिफिकेशन का मास्टरस्ट्रोक: वोटिंग के बीच अधिसूचना जारी कर सरकार ने यह संदेश दिया कि वह अपनी तरफ से प्रतिबद्ध है। अब यदि देरी होती है, तो भाजपा इसका दोष विपक्ष के सिर मढ़ सकती है कि “हमने तो कानून लागू कर दिया था, लेकिन विपक्ष ने संशोधनों को रोक दिया।”
  3. अगला कदम: जानकारों का मानना है कि सरकार अब अध्यादेश (Ordinance) या अगले सत्र में नए स्वरूप में बिल लाकर इसे फिर से साधने की कोशिश कर सकती है, ताकि 2029 के चुनावों से पहले सीटों का कोटा तय हो सके।

विधेयक के गिरने का मुख्य कारण

विवरणआंकड़े / तथ्य
जरूरी वोट (2/3 बहुमत)352
पक्ष में मिले वोट298
विरोध में वोट230
विवाद का केंद्रसीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करना और 2011 की जनगणना का आधार लेना।

‘नारी शक्ति एक्ट’ का नोटिफिकेशन यह दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में नहीं डालना चाहती। 2029 के रण में ‘महिला वोटर’ एक निर्णायक शक्ति हैं, और कोई भी दल खुद को महिला विरोधी नहीं दिखाना चाहता। आगामी महीनों में हम इस पर दोबारा विधायी सक्रियता देख सकते हैं।

क्या आपको लगता है कि विपक्ष द्वारा परिसीमन का विरोध करना दक्षिण भारत के हितों की रक्षा के लिए जरूरी था, या यह सिर्फ राजनीति है?

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