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इजरायल चुनाव पर दुनिया की नजर, नेतन्याहू हारे तो क्या होगा? भारत से बदल जाएगी दोस्ती? कितना पड़ेगा असर?

इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर को हो रहे आम चुनाव पर भारत की भी नजरें टिकी हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता बरकरार रहती है या विपक्ष उन्हें चुनौती देकर सरकार बदलने में कामयाब होता है, इसका असर पश्चिम एशिया की राजनीति पर पड़ सकता है। लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल है कि अगर नेतन्याहू चुनाव हार गए, तो क्या भारत और इजरायल के रिश्तों में भी बदलाव आएगा?

विशेषज्ञों का आकलन है कि नेतन्याहू की विदाई से दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी खत्म होने की आशंका नहीं है। रक्षा, सुरक्षा, तकनीक और व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहयोग की मजबूत नींव है। हालांकि, नए प्रधानमंत्री के आने से दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच समीकरण और कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव संभव है।

नेतन्याहू और मोदी की दोस्ती कितनी अहम?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू के व्यक्तिगत संबंधों ने भारत-इजरायल रिश्तों को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दोनों देशों के बीच रक्षा खरीद, खुफिया सहयोग, कृषि, जल प्रबंधन और आधुनिक तकनीक के क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत हुई है।

फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को ‘शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक बढ़ाया। इसके तहत रक्षा, व्यापार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, कृषि और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।

ऐसे में नेतन्याहू की संभावित हार से राजनीतिक नेतृत्व जरूर बदल सकता है, लेकिन दोनों देशों के बीच बने संस्थागत और रणनीतिक संबंधों का अचानक खत्म होना मुश्किल माना जा रहा है।

क्या विपक्ष की सरकार भारत से दूरी बनाएगी?

नेतन्याहू को चुनौती देने वाले प्रमुख नेताओं में पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट शामिल हैं। चुनाव के बाद सरकार किसकी बनेगी, यह केवल किसी एक पार्टी के प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि संसद में बहुमत जुटाने की क्षमता पर भी निर्भर करेगा।

इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इसलिए चुनाव में किसी पार्टी के सबसे आगे रहने के बावजूद गठबंधन को लेकर बातचीत लंबी खिंच सकती है।

इजरायली लेखक और राजनीतिक विश्लेषक एलेक पोलार्ड का मानना है कि चुनाव में कोई भी जीते, भारत और इजरायल की करीबी बनी रहने की संभावना है। उनके अनुसार, भारत के साथ संबंधों को इजरायल में गंभीरता से लिया जाता है और नया नेतृत्व भी प्रधानमंत्री मोदी के साथ संबंध मजबूत करने का अवसर पा सकता है।

रक्षा सौदों और तकनीकी सहयोग पर क्या होगा असर?

भारत के लिए इजरायल एक महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार है। सैन्य उपकरणों, निगरानी प्रणालियों, ड्रोन, मिसाइल तकनीक और सुरक्षा संबंधी सहयोग में दोनों देशों के हित जुड़े हैं। इसके अलावा कृषि तकनीक, जल संरक्षण, साइबर सुरक्षा और एआई जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ रही है।

अगर नेतन्याहू सत्ता से बाहर होते हैं, तो नए नेतृत्व के साथ भारत को कूटनीतिक तालमेल स्थापित करना होगा। कुछ परियोजनाओं की प्राथमिकता या बातचीत की गति में बदलाव आ सकता है, लेकिन दीर्घकालिक हित सहयोग जारी रखने के पक्ष में हैं। इसलिए केवल नेतृत्व परिवर्तन के आधार पर रक्षा सौदों या मौजूदा समझौतों के रुकने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

ईरान और पश्चिम एशिया की स्थिति भी अहम

भारत-इजरायल संबंधों पर चुनाव का असर समझने के लिए पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति को भी देखना होगा। भारत के इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी हित हैं, वहीं ईरान और खाड़ी देशों के साथ भी उसके महत्वपूर्ण आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक संबंध हैं।

नेतन्याहू की सरकार के तहत ईरान को लेकर सख्त रुख जारी रहने की संभावना है। विपक्ष की सरकार बनने पर कूटनीतिक भाषा और क्षेत्रीय तनाव से निपटने के तरीके में बदलाव हो सकता है। हालांकि, प्रमुख विपक्षी नेताओं का भी ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने पर जोर रहा है। इसलिए सत्ता परिवर्तन का अर्थ इजरायल की सुरक्षा नीति में पूरी तरह उलटफेर होना नहीं है।

भारत के लिए क्या है सबसे बड़ा संदेश?

भारत के लिए महत्वपूर्ण यह है कि इजरायल में नई सरकार बनने की स्थिति में भी रक्षा, तकनीक, निवेश और व्यापार से जुड़े सहयोग को निरंतरता मिले। नेतन्याहू की व्यक्तिगत दोस्ती ने दोनों देशों के रिश्तों को मजबूती दी है, लेकिन अब ये संबंध केवल दो नेताओं तक सीमित नहीं हैं।

अगर नेतन्याहू चुनाव हारते हैं, तो भारत-इजरायल दोस्ती पर तत्काल बड़े संकट की आशंका नहीं है। हालांकि, नए नेतृत्व की प्राथमिकताएं, गठबंधन की संरचना और पश्चिम एशिया में बदलते हालात आगे के रिश्तों की दिशा तय करेंगे। भारत के लिए चुनौती होगी कि वह इजरायल के साथ मजबूत साझेदारी बनाए रखते हुए ईरान और अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ अपने हितों का संतुलन भी कायम रखे।

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