दुनिया की राजनीति में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने कई देशों के सामने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने की चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित समझ या दुनिया के बड़े फैसलों में दोनों महाशक्तियों के दबदबे की आशंका ने मध्यम शक्तियों की चिंता बढ़ाई है। ऐसे समय में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक अहम संदेश दिया है—भारत ने बिना छाते के बारिश में रहना सीख लिया है। उनका आशय है कि किसी बड़ी शक्ति की सुरक्षा या संरक्षण पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना भी अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना जरूरी है।
क्या है G2 और इससे क्यों चिंतित हैं दूसरे देश?
G2 शब्द का इस्तेमाल अमेरिका और चीन की ऐसी व्यवस्था के संदर्भ में किया जाता है, जिसमें दुनिया के प्रमुख मुद्दों पर इन दोनों देशों का प्रभाव सबसे अधिक हो। यह कोई औपचारिक वैश्विक संगठन नहीं है, बल्कि दो महाशक्तियों के बीच संभावित प्रभुत्व या समझ की अवधारणा है।
छोटे और मध्यम आकार की अर्थव्यवस्थाओं को चिंता है कि यदि वैश्विक व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और कूटनीति से जुड़े फैसले मुख्य रूप से वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच होने लगे, तो उनके हित पीछे छूट सकते हैं। अमेरिका की टैरिफ नीतियों और चीन के साथ बढ़ते रणनीतिक तनाव ने इस बहस को और तेज किया है।
जयशंकर का फॉर्मूला: किसी एक शक्ति पर निर्भर मत रहिए
13 अक्टूबर को दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में जयशंकर ने भारत की वैश्विक स्थिति और बदलती विश्व व्यवस्था पर अपनी बात रखी। उन्होंने भारत को केवल ‘मिडिल पावर’ कहने के बजाय ‘पावर इन द मिडिल’ बताया। उनका तर्क था कि भारत की आबादी, अर्थव्यवस्था और विकास की संभावनाओं को देखते हुए उसे केवल मध्यम शक्ति के दायरे में सीमित करना उचित नहीं है।
जयशंकर के विचार का अहम हिस्सा रणनीतिक स्वायत्तता है। इसका अर्थ है कि भारत अपने हितों के अनुसार अमेरिका, रूस, चीन और यूरोपीय देशों के साथ संबंध तय करे, न कि किसी एक देश के दबाव में अपनी नीतियां बनाए।
क्या हैं ‘चोक पॉइंट्स’, जिन पर दिया जोर?
जयशंकर ने दुनिया को ‘चोक पॉइंट्स’ यानी ऐसे महत्वपूर्ण संसाधनों, तकनीकों और व्यवस्थाओं से प्रभावित बताया, जिन पर नियंत्रण किसी देश को दूसरों पर दबाव बनाने की ताकत देता है। इसमें दुर्लभ खनिज, वित्तीय व्यवस्था, प्रतिबंध और अहम आपूर्ति शृंखलाएं शामिल हो सकती हैं।
उनके मुताबिक, देशों को ऐसे क्षेत्रों में अपनी क्षमता विकसित करनी चाहिए, जहां दूसरे देश उनके योगदान के बिना आसानी से काम न कर सकें। इससे उनकी सौदेबाजी की ताकत बढ़ सकती है।
क्या दूसरे देश भी अपनाएंगे भारत का रास्ता?
कनाडा समेत कई देश व्यापार और सुरक्षा के लिए नए साझेदार तलाश रहे हैं। भारत भी क्वाड और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे जैसी पहलों के जरिए अलग-अलग देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
हालांकि, हर देश की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति अलग है। इसलिए भारत का मॉडल सभी देश हूबहू नहीं अपना सकते। लेकिन साझेदारों में विविधता, घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना और किसी एक महाशक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचना उनके लिए उपयोगी रणनीति हो सकती है।


