प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्रिपरिषद के संभावित विस्तार और फेरबदल को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। मौजूदा समय में केंद्रीय मंत्रिपरिषद में 68 मंत्री हैं, जबकि संविधान के तहत इसकी अधिकतम संख्या 81 हो सकती है। यानी 13 पद अभी खाली हैं। इसके अलावा करीब 40 फीसदी कैबिनेट मंत्री एक से ज्यादा मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ऐसे में संसद के आगामी शीतकालीन सत्र से पहले मंत्रिपरिषद में बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
कई बड़े मंत्रालयों की जिम्मेदारी एक ही मंत्री के पास
मौजूदा व्यवस्था में कई वरिष्ठ मंत्रियों के पास एक से अधिक मंत्रालय हैं। इनमें अमित शाह, जेपी नड्डा, शिवराज सिंह चौहान, निर्मला सीतारमण, मनोहर लाल, प्रल्हाद जोशी, अश्विनी वैष्णव और जी. किशन रेड्डी जैसे नाम शामिल हैं। कुछ मंत्रियों के पास तीन तक मंत्रालयों की जिम्मेदारी है। इससे सरकार के भीतर खाली पदों को भरने और अतिरिक्त प्रभार बांटने की जरूरत बढ़ी है।
प्रधानमंत्री कार्यालय की 25 जुलाई 2026 की आधिकारिक सूची में भी कई वरिष्ठ मंत्रियों के पास एक से अधिक मंत्रालय दर्ज हैं। उदाहरण के लिए अश्विनी वैष्णव रेल, सूचना एवं प्रसारण और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय संभाल रहे हैं, जबकि प्रल्हाद जोशी के पास उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा के साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार है।
खाली पदों के साथ बढ़ी फेरबदल की चर्चा
हाल के महीनों में मंत्रिपरिषद में कई बदलाव हुए हैं। धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्रालय से हटने के बाद प्रल्हाद जोशी को अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई। वहीं कुछ मंत्रियों के राज्यसभा कार्यकाल और राजनीतिक जिम्मेदारियों में बदलाव से भी भविष्य में नए पद खाली होने की स्थिति बन सकती है।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए भाजपा की ताजा उम्मीदवार सूची में जगह नहीं मिली है। उनके अलावा राज्य मंत्री बीएल वर्मा को भी दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया गया। इससे मंत्रिपरिषद में आगे होने वाले बदलाव को लेकर चर्चाएं और तेज हुई हैं।
यूपी और पंजाब चुनावों का भी दिख सकता है असर
संभावित विस्तार को केवल खाली पद भरने तक सीमित नहीं माना जा रहा है। आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनावों को देखते हुए क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संतुलन भी महत्वपूर्ण हो सकता है। विभिन्न रिपोर्टों में नए चेहरों, सहयोगी दलों और चुनावी राज्यों को मंत्रिपरिषद में अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने की संभावना पर चर्चा है। हालांकि अंतिम फैसला प्रधानमंत्री और भाजपा नेतृत्व के स्तर पर होना है।
मंत्रिपरिषद में संभावित बदलाव के लिए अक्तूबर से नवंबर के बीच का समय महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक 10 अक्तूबर के बाद राजनीतिक गतिविधियों के लिए अनुकूल समय बन सकता है और 16 अक्तूबर के राज्यसभा चुनाव के बाद तस्वीर और स्पष्ट होने की संभावना है। शीतकालीन सत्र नवंबर के अंत या दिसंबर की शुरुआत में शुरू होने की संभावना के बीच उससे पहले फेरबदल के लिए समय उपलब्ध है।
ऐसे में अब नजर इस बात पर है कि सरकार केवल खाली पदों को भरती है या आगामी चुनावों और प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए व्यापक मंत्रिपरिषद विस्तार और फेरबदल करती है।


