आज, 25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी चांदनी अमृत के समान मानी जाती है। इसी विश्वास के चलते इस रात दूध और चावल से बनी खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा है। इस बार खीर रखने और कोजागरी पूजा के लिए मध्यरात्रि में लगभग 51 मिनट का विशेष मुहूर्त बताया गया है। इस दौरान माता लक्ष्मी की पूजा और चांदनी में खीर रखने को शुभ माना गया है। आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा पर खीर रखने का सही समय, पूजा का मुहूर्त और इस पर्व से जुड़ी मान्यताएं।
खीर रखने का शुभ मुहूर्त कब से कब तक?
पंचांग के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखने के लिए निशीथ काल का समय विशेष माना गया है। इस साल यह मुहूर्त रात 11 बजकर 40 मिनट से शुरू होकर 26 अक्टूबर को रात 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। यानी श्रद्धालुओं को खीर रखने के लिए करीब 51 मिनट का शुभ समय मिलेगा।
खीर रखने का विशेष मुहूर्त-रात 11:40 से 12:31 बजे तक
25 अक्टूबर की रात से 26 अक्टूबर की मध्यरात्रि तक
चंद्रोदय-शाम 5:00 बजे, पूर्णिमा तिथि-25 अक्टूबर, सुबह 11:55 से
26 अक्टूबर को सुबह 9:41 बजे तक-यह समय प्रकाशित पंचांग के अनुसार है। चंद्रोदय और अन्य स्थानीय समय में शहर के अनुसार अंतर हो सकता है।
शरद पूर्णिमा पर पूजा का शुभ समय
शरद पूर्णिमा पर शाम के समय माता लक्ष्मी की पूजा करना शुभ माना जाता है। इस दिन पूजा के लिए चौघड़िया मुहूर्त भी बताए गए हैं।
- शुभ चौघड़िया: शाम 5:42 से 7:18 बजे तक।
- अमृत चौघड़िया: शाम 7:18 से 8:54 बजे तक।
- कोजागरी पूजा का निशीथ काल: रात 11:40 से 12:31 बजे तक।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और यह देखती हैं कि कौन जागकर उनकी आराधना कर रहा है। इसी वजह से इस पर्व को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। हालांकि, पूजा का सटीक समय स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।
शरद पूर्णिमा पर खीर रखने की क्या है परंपरा?
शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर खुले स्थान पर चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों से खीर में अमृत तुल्य गुण आ जाते हैं। अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
इस अवसर पर चंद्रमा की पूजा करने के साथ भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना भी की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है।
कैसे करें माता लक्ष्मी की पूजा?
शरद पूर्णिमा पर पूजा करने के लिए शाम को घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और घी का दीपक जलाएं। इसके बाद माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करें। उन्हें फल, मिठाई और खीर का भोग लगाएं। श्रद्धालु इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा भी सुन सकते हैं।
रात में खीर को साफ बर्तन में रखकर मलमल के कपड़े से ढक दें, ताकि चांदनी पड़ने के साथ धूल-मिट्टी और कीड़े-मकोड़ों से भी बचाव हो सके। शुभ मुहूर्त में खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखें। अगले दिन पूजा के बाद इसे प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा है।
क्यों खास है शरद पूर्णिमा की रात?
शरद पूर्णिमा को वर्ष की सबसे खास पूर्णिमा में से एक माना जाता है। ब्रज क्षेत्र में इस रात भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से भी इसका संबंध जोड़ा जाता है। वहीं, कई जगहों पर लोग रातभर जागकर भजन-कीर्तन करते हैं और माता लक्ष्मी से धन, वैभव तथा सुख-शांति की कामना करते हैं।
हालांकि, चांदनी में रखी खीर के औषधीय गुण बढ़ने या उसमें अमृत आने की मान्यता धार्मिक आस्था का हिस्सा है, इसका वैज्ञानिक प्रमाण स्थापित नहीं है। खीर को खुले में रखते समय स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा की पूजा और चांदनी में खीर रखने के लिए 25 अक्टूबर की रात प्रमुख है। 26 अक्टूबर की सुबह पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी। इसलिए पूजा और प्रसाद की तैयारी करते समय तिथि तथा स्थानीय पंचांग का ध्यान रखें।


