भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। भारत के संधि को अप्रैल 2025 से ‘पाबंदी में रखने’ के फैसले के बाद पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठा रहा है। अब OIC की बैठक में पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार के बयान के बाद पाकिस्तान के विशेषज्ञों और नेताओं की ओर से परमाणु विकल्प तक की बातें सामने आ रही हैं। हालांकि, ऐसी टिप्पणियां व्यक्तिगत या राजनीतिक बयान हैं, इन्हें पाकिस्तान सरकार की औपचारिक परमाणु नीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
OIC में इशाक डार ने क्या कहा?
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र से इतर OIC संपर्क समूह की बैठक में पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि भारत संधि को एकतरफा तरीके से स्थगित नहीं कर सकता। डार के मुताबिक, यह एक बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता है और इसमें किसी एक पक्ष को अपनी तरफ से इसे निलंबित करने का प्रावधान नहीं है।
डार ने हेग स्थित मध्यस्थता अदालत के हालिया फैसले का भी हवाला दिया। अदालत ने अगस्त 2026 में कहा था कि संधि प्रभावी बनी हुई है। भारत हालांकि इस कार्यवाही और अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता और अपने फैसले पर कायम है।
परमाणु धमकी की चर्चा क्यों?
संधि को लेकर पाकिस्तान में बयानबाजी इससे पहले भी तीखी रही है। जून 2026 में इस्लामाबाद में आयोजित सिंधु जल संधि से जुड़े एक सम्मेलन में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा था कि अगर संधि बहाल कराने के सभी प्रयास विफल होते हैं तो पाकिस्तान को ‘परमाणु विकल्प’ पर विचार करना चाहिए। इसी सम्मेलन में पाकिस्तान के जलवायु मंत्री मुसादिक मलिक ने भी भारत को लेकर बेहद कड़ा बयान दिया था।
ऐसे बयानों के बीच पानी का मुद्दा भारत-पाकिस्तान संबंधों में सुरक्षा और रणनीतिक बहस से भी जुड़ गया है। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया है कि मौजूदा भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं की भंडारण क्षमता सीमित है और पश्चिमी नदियों का पानी रोकने की वास्तविक क्षमता पर अलग-अलग आकलन मौजूद हैं।
1960 में हुई थी संधि
सिंधु जल संधि पर भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षर किए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई इस व्यवस्था में सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों को दोनों देशों के बीच बांटा गया। भारत को रावी, ब्यास और सतलुज पर अधिकार मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब को पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। पश्चिमी नदियों पर भारत को कुछ शर्तों के साथ जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति भी संधि में है।
आगे क्या?
फिलहाल विवाद का एक हिस्सा कानूनी और दूसरा कूटनीतिक है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों और OIC जैसे संगठनों के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर, भारत का रुख है कि संधि को तब तक बहाल नहीं किया जाएगा जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के संबंध में विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं करता। इस पूरे विवाद में परमाणु हथियारों का उल्लेख तनाव को और संवेदनशील बनाता है, लेकिन विशेषज्ञों और नेताओं के बयानों को आधिकारिक परमाणु नीति से अलग करके देखना जरूरी है।


