भगत सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन क्रांतिकारियों में लिया जाता है, जिन्होंने कम उम्र में ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना। लेकिन उनका क्रांतिकारी जीवन अचानक शुरू नहीं हुआ था। परिवार का माहौल, जलियांवाला बाग हत्याकांड, असहयोग आंदोलन की वापसी और समाजवादी विचारों से परिचय जैसी कई घटनाओं ने उनकी राजनीतिक सोच को आकार दिया। भारत सरकार के Dictionary of Martyrs के अनुसार, भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 में पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में हुआ था।
परिवार और बचपन से मिला राष्ट्रवादी माहौल
भगत सिंह ऐसे परिवार में पले-बढ़े जहां ब्रिटिश शासन के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों का प्रभाव था। किशोरावस्था में ही वे राष्ट्रीय आंदोलन से प्रभावित हुए। 1920-22 के असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने छात्र जीवन में हिस्सा लिया। हालांकि बाद की घटनाओं ने उनके राजनीतिक विचारों को एक अलग दिशा दी।
जलियांवाला बाग ने छोड़ी गहरी छाप
1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड देश के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए निर्णायक घटनाओं में से एक था। अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश सैनिकों की गोलीबारी में बड़ी संख्या में लोग मारे गए। इस घटना का प्रभाव पंजाब के युवाओं पर गहरा पड़ा। सरकारी ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी जलियांवाला बाग को ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनभावना को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण घटना के रूप में दर्ज किया गया है।
भगत सिंह के जीवन से जुड़ी लोकप्रिय ऐतिहासिक कथाओं में बताया जाता है कि इस घटना ने उनके मन पर गहरा असर डाला। आगे चलकर ब्रिटिश शासन के प्रति उनका विरोध और अधिक स्पष्ट होता गया।
असहयोग आंदोलन की वापसी से अलग रास्ते की तलाश
1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इसके बाद आंदोलन के तरीकों और स्वतंत्रता हासिल करने की रणनीति को लेकर युवाओं के बीच बहस बढ़ी। भगत सिंह भी धीरे-धीरे ऐसे रास्ते की ओर बढ़े जिसमें औपनिवेशिक शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ वैचारिक और राजनीतिक संगठन पर जोर था।
उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में अध्ययन किया, जिसकी स्थापना लाला लाजपत राय ने की थी। यहां उन्हें इतिहास, राजनीति और दुनिया में चल रहे क्रांतिकारी आंदोलनों को समझने का अवसर मिला। इसी दौरान उनका संपर्क भगवती चरण वोहरा और सुखदेव जैसे युवाओं से हुआ।
नौजवान भारत सभा और समाजवादी विचार
1926 में भगत सिंह, सुखदेव और भगवती चरण वोहरा ने नौजवान भारत सभा की स्थापना की। भगत सिंह इसके सचिव बने। संगठन का उद्देश्य युवाओं को राजनीतिक रूप से जागरूक करना और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए तैयार करना था। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस दौर में भगत सिंह समाजवादी विचारों की ओर भी तेजी से आकर्षित हुए और उन्होंने लेखन के माध्यम से अपने विचार व्यक्त किए।
1925 में वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े और 1928 में इसके समाजवादी रूपांतरण हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए।
लाला लाजपत राय की मौत और सांडर्स की हत्या
1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद HSRA ने पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को निशाना बनाने का फैसला किया। हालांकि 17 दिसंबर 1928 को पहचान की गलती के कारण सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सांडर्स की हत्या कर दी गई। इसमें भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद की भूमिका रही।
असेंबली बम कांड और विचारों का प्रचार
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका। उनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के खिलाफ राजनीतिक संदेश देना और अपनी आवाज को व्यापक स्तर तक पहुंचाना था। इसके बाद दोनों ने गिरफ्तारी दी। जेल में भगत सिंह ने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों और बेहतर व्यवहार की मांग को लेकर आंदोलन किया।
भगत सिंह का जीवन केवल हथियारबंद क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं था। वे लेखन, अध्ययन और समाजवादी विचारों पर भी लगातार काम कर रहे थे। उनके लेखों और दस्तावेजों में स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक बराबरी के सवाल भी दिखाई देते हैं।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई। उनकी उम्र उस समय 23 वर्ष के आसपास थी। कम उम्र में उनकी शहादत ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे चर्चित क्रांतिकारी चेहरों में शामिल कर दिया।


