बांग्लादेश की तीस्ता नदी परियोजना अब केवल पानी, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण तक सीमित नहीं रह गई है। इसके साथ क्षेत्रीय रणनीति और बड़ी शक्तियों के प्रभाव की प्रतिस्पर्धा भी जुड़ती जा रही है। चीन लंबे समय से इस परियोजना में रुचि दिखाता रहा है, जबकि भारत नदी के जल बंटवारे और अपनी रणनीतिक सुरक्षा को लेकर सतर्क है। अमेरिका की बढ़ती दिलचस्पी और अब नीदरलैंड की ओर से तकनीकी सहयोग के प्रस्ताव ने इस परियोजना को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि, इन देशों की भूमिका और भागीदारी के स्तर अलग-अलग हैं। >
क्या है तीस्ता नदी परियोजना?
तीस्ता नदी हिमालय से निकलती है और सिक्किम तथा पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश पहुंचती है। वहां यह नदी खेती, सिंचाई, मत्स्य पालन और लाखों लोगों की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश में शुष्क मौसम के दौरान पानी की कमी और मानसून में बाढ़ तथा नदी कटाव बड़ी समस्याएं हैं।
इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट की योजना बनाई गई है। इसमें नदी की खुदाई, तटबंधों को मजबूत करना, बाढ़ नियंत्रण, जल प्रबंधन और नदी के आसपास बुनियादी ढांचे के विकास जैसे काम शामिल हैं।
चीन की भूमिका से भारत क्यों सतर्क?
चीन की सरकारी कंपनी पावरचाइना इस परियोजना से जुड़ी रही है। जून 2026 में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने तीस्ता परियोजना पर सहयोग और व्यवहार्यता अध्ययन को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी।
भारत की चिंता का प्रमुख कारण परियोजना की भौगोलिक स्थिति है। तीस्ता नदी का क्षेत्र भारत के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर के निकट है। यह संकरा भूभाग भारत के मुख्य हिस्से को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। इसलिए इस इलाके में चीन की दीर्घकालिक मौजूदगी को भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञ सुरक्षा के नजरिये से भी देखते हैं।
भारत ने स्पष्ट किया है कि तीस्ता परियोजना पर उसके विचार बांग्लादेश को पहले ही बता दिए गए हैं और वह क्षेत्र के घटनाक्रम पर नजर रख रहा है। दोनों देशों के बीच नदी के पानी के बंटवारे का समझौता भी लंबे समय से लंबित है।
अमेरिका की दिलचस्पी के क्या मायने?
अमेरिका पहले से ही दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव पर नजर रखता है। फरवरी 2026 में अमेरिकी राजदूत ने बांग्लादेश के साथ रक्षा और आर्थिक सहयोग बढ़ाने तथा चीनी रक्षा उपकरणों के विकल्प उपलब्ध कराने की बात कही थी। तीस्ता क्षेत्र में अमेरिकी दिलचस्पी की चर्चा इसी व्यापक क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में हो रही है। हालांकि, तीस्ता परियोजना में अमेरिका की औपचारिक वित्तीय या निर्माण संबंधी भागीदारी को अभी स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
नीदरलैंड की एंट्री से बदलेगा समीकरण?
14 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, नीदरलैंड ने तीस्ता मास्टरप्लान के व्यवहार्यता अध्ययन और तकनीकी सहायता में दिलचस्पी दिखाई है। बांग्लादेश के लिए यह विकल्प परियोजना को केवल किसी एक देश के वित्त और विशेषज्ञता पर निर्भर रहने से बचाने में मदद कर सकता है।
फिलहाल परियोजना निर्माण के चरण में नहीं पहुंची है। बांग्लादेश नए व्यवहार्यता अध्ययन के जरिए इसकी जरूरत, लागत और तकनीकी पहलुओं का आकलन करना चाहता है। अध्ययन मार्च 2028 तक पूरा होने का लक्ष्य है, इसलिए निर्माण कार्य 2029 से पहले शुरू होने की संभावना कम बताई गई है।
इस तरह तीस्ता परियोजना के सामने दोहरी चुनौती है—बांग्लादेश को अपनी नदी और किसानों की जरूरतों के लिए समाधान चाहिए, जबकि भारत, चीन और अन्य देशों के लिए यह क्षेत्रीय प्रभाव तथा सहयोग की अहम कसौटी बनती जा रही है।


