भारत में विपक्षी दलों और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों की टिप्पणियों पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने भारत के आंतरिक राजनीतिक मामलों में दखल देने से इनकार करते हुए कहा कि भारत एक लोकतंत्र है और यहां राजनीतिक फैसले भारतीय जनता को ही करने हैं। इस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों पर तंज कसते हुए उनके नाम को ही सवालों के घेरे में खड़ा किया।
रूबियो का यह बयान ऐसे समय आया है, जब भारत और संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के बीच दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों तथा पुलिस की कथित कार्रवाई को लेकर बयानबाजी चल रही है। भारत ने पहले ही मानवाधिकारों के मुद्दे पर चुनिंदा देशों को निशाना बनाने और अपुष्ट आंकड़ों के आधार पर देश की छवि खराब करने के प्रयासों पर आपत्ति जताई है।
‘यूएन विशेषज्ञ अपने आप में विरोधाभास हैं?’
मुंबई में पत्रकारों से बातचीत के दौरान रूबियो से भारत में विपक्षी दलों और छात्रों के प्रदर्शनों पर सवाल पूछा गया। पत्रकार ने संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की ओर से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित कार्रवाई की आलोचना का भी जिक्र किया।
इस पर रूबियो ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ, हां, मेरे पसंदीदा। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ या यह अपने आप में एक विरोधाभास है?”
इसके बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका भारत के घरेलू राजनीतिक मामलों में अपनी राय नहीं थोपना चाहता। उन्होंने कहा कि भारत में चुनाव होते हैं और यह एक लोकतांत्रिक देश है। इसलिए वहां की राजनीतिक परिस्थितियों पर फैसला करना और उनसे निपटना भारतीयों का काम है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसा में बताया अंतर
रूबियो ने कहा कि लोगों का अपनी बात रखना और अलग-अलग राजनीतिक विचार व्यक्त करना लोकतांत्रिक समाज की महत्वपूर्ण विशेषता है। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और तोड़फोड़, आगजनी तथा संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाली हिंसक गतिविधियों के बीच अंतर भी स्पष्ट किया।
क्यूबा का उदाहरण देते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि वहां विपक्षी आवाजों को जेल, दमन और निर्वासन जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने भारत में हो रहे प्रदर्शनों पर कोई सीधा फैसला देने से परहेज किया और दोहराया कि यह भारत का आंतरिक मामला है।
भारत ने यूएन की टिप्पणियों पर जताई थी आपत्ति
इससे पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारतीय विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने मानवाधिकारों के इस्तेमाल को राजनीतिक दबाव का माध्यम बनाने का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि अपुष्ट आरोपों और अधूरे आंकड़ों के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की छवि खराब करने का प्रयास नहीं होना चाहिए।
वहीं, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान कथित तौर पर अत्यधिक बल प्रयोग, हिरासत और शांतिपूर्ण सभा पर प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने इन मामलों की जांच और प्रदर्शन के अधिकार का सम्मान करने की अपील की थी। भारत ने इन टिप्पणियों को एकतरफा बताते हुए निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित आकलन पर जोर दिया है।
रूबियो के बयान से स्पष्ट है कि अमेरिका ने इस विवाद पर किसी पक्ष का समर्थन करने के बजाय इसे भारत के घरेलू राजनीतिक दायरे में रखा है। हालांकि, प्रदर्शनों और मानवाधिकारों से जुड़े आरोपों पर भारत तथा संयुक्त राष्ट्र के बीच मतभेद फिलहाल बने हुए हैं।


