देश के कई हिस्सों में मौसम का बदला मिजाज अब खेती और बिजली व्यवस्था दोनों के लिए चुनौती बनता दिख रहा है। कमजोर मानसून और कम बारिश का असर जलाशयों और जलविद्युत उत्पादन पर पड़ा है। दूसरी ओर अक्तूबर की शुरुआत में गर्मी और उमस के कारण बिजली की मांग बढ़ गई है। ऐसे में आने वाले रबी सीजन में सिंचाई की जरूरत बढ़ने पर बिजली संकट और गहरा सकता है।
कम बारिश के कारण कई इलाकों में खरीफ फसलों की सिंचाई के लिए किसानों को अतिरिक्त पानी और बिजली की जरूरत पड़ रही है। वहीं, देश के 178 प्रमुख बांधों और जलाशयों में 28 सितंबर तक पानी का भंडारण कुल क्षमता का करीब 70 फीसदी रह गया था। यह पिछले 10 वर्षों के औसत 76.62 फीसदी से कम है। जलस्तर में कमी का सीधा असर जलविद्युत उत्पादन पर पड़ रहा है।
बिजली की मांग और उपलब्धता में बढ़ा अंतर
ग्रिड-इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक सितंबर में देश में बिजली की कमी बढ़कर 54.4 करोड़ यूनिट हो गई, जबकि अगस्त में यह 9.8 करोड़ यूनिट थी। सितंबर में शाम के समय बिजली की कमी अधिकतम 7.7 गीगावॉट तक पहुंची। गर्मी और उमस के चलते पंखे, कूलर और एसी का इस्तेमाल बढ़ने से मांग पर अतिरिक्त दबाव बना है।
जलविद्युत उत्पादन घटने के बाद ताप बिजली संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ रही है। इससे कोयले की खपत भी बढ़ी है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार 27 सितंबर तक 168 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में से 72 में कोयले का स्टॉक तय मानक के 25 फीसदी से भी नीचे था। 30 सितंबर तक ऐसे संयंत्रों की संख्या बढ़कर 84 हो गई।
यूपी-पंजाब समेत कई राज्यों पर दबाव
पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में भी बिजली और कोयले की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली रही। सितंबर में पंजाब में 911.5 लाख यूनिट, उत्तर प्रदेश में 430.5 लाख यूनिट और राजस्थान में 371.3 लाख यूनिट बिजली की कमी दर्ज की गई।
हिमाचल प्रदेश में भी कम बारिश के कारण जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हुआ है। राज्य में रोजाना करीब 280-300 लाख यूनिट बिजली का उत्पादन हो रहा है, जबकि खपत 380 लाख यूनिट से अधिक है। यानी रोजाना 80 से 100 लाख यूनिट तक का अंतर सामने आ रहा है। कई इलाकों में अघोषित बिजली कटौती भी शुरू हो गई है।
ऐसे में मौसम की अनिश्चितता का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। कम बारिश, घटते जल भंडार और कोयले के दबाव के बीच आने वाला रबी सीजन बिजली व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।


