भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक बार फिर टैरिफ और प्रतिबंधों का मुद्दा गरमा गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने वाला कानून मिल चुका है। भारत इस कानून के दायरे में आ सकता है, हालांकि अभी भारत पर 100 फीसदी टैरिफ अपने आप लागू नहीं हुआ है। ऐसे समय में करीब 25 साल पुराना वह घटनाक्रम फिर चर्चा में है, जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान अमेरिका ने भारत पर लगाए परमाणु प्रतिबंधों में बड़ी राहत दी थी।
पोखरण के बाद अमेरिका ने लगाए थे कड़े प्रतिबंध
मई 1998 में भारत ने पोखरण-II परमाणु परीक्षण किए। इसके बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए। इनमें आर्थिक सहायता, कुछ वित्तीय सहयोग, रक्षा सहयोग और संवेदनशील तकनीक के हस्तांतरण पर पाबंदियां शामिल थीं। मकसद भारत के परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बनाना था।
हालांकि भारत ने परमाणु नीति से पीछे हटने के बजाय आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर दूसरे रास्ते तलाशे। इस दौरान उसके व्यापारिक संबंध अमेरिका के अलावा यूरोप, रूस, खाड़ी देशों और एशिया के अन्य बाजारों के साथ बने रहे। उपलब्ध विश्लेषणों के मुताबिक, प्रतिबंधों का असर हुआ, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार संबंध पूरी तरह बाधित नहीं हुए।
22 सितंबर 2001 को बदला अमेरिकी रुख
22 सितंबर 2001 को राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने भारत और पाकिस्तान पर लगे कई परमाणु-संबंधी प्रतिबंधों को माफ कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया था कि इन प्रतिबंधों को जारी रखना अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा हित में नहीं है।
इसके बाद भारत-अमेरिका संबंधों में धीरे-धीरे सुधार आया। अमेरिकी विदेश विभाग के दस्तावेज के अनुसार, भारत के साथ सैन्य अभ्यास, हाई-टेक व्यापार और दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने लगा।
अब ट्रंप के सामने अलग परिस्थिति
2026 में मामला परमाणु परीक्षण का नहीं, बल्कि रूस से ऊर्जा खरीद का है। 18 सितंबर को ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े नए कानून पर हस्ताक्षर किए। कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में रूस से तेल या गैस खरीदने वाले देशों के सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर स्वतः 100 फीसदी शुल्क लग चुका है।
भारत ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा है कि सरकार कानून की बारीकियों का अध्ययन कर रही है।
क्या इतिहास दोहराया जा सकता है?
2001 और 2026 की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। तब प्रतिबंधों की वजह भारत के परमाणु परीक्षण थे, जबकि अब विवाद रूस से तेल खरीदने को लेकर है। फिर भी दोनों घटनाओं में एक समान पहलू यह है कि अमेरिका आर्थिक दबाव के जरिए भारत की रणनीतिक नीति पर प्रभाव डालने की कोशिश कर रहा है।
इसलिए 2001 का अनुभव भारत के लिए एक संदर्भ जरूर देता है, लेकिन यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि मौजूदा टैरिफ भी उसी तरह समाप्त होंगे। इस बार भारत की ऊर्जा जरूरतें, अमेरिकी बाजार पर निर्भरता, रूस के साथ संबंध और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता—सभी कारक आगे की दिशा तय करेंगे।


