दशहरा और दिवाली से पहले रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती लागत का असर अब पैकेट के आकार और कीमत में भी नजर आने लगा है। कंपनियां सीधे दाम बढ़ाने के बजाय छोटे पैक में सामान की मात्रा घटा रही हैं, जबकि बड़े पैक पर कीमत बढ़ाई जा रही है। बिस्कुट, नमकीन, नूडल्स, साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, चाय और चीनी जैसे कई उत्पादों में यह बदलाव देखने को मिल रहा है।
छोटे पैक में 2 से 7 फीसदी तक कमी
रिपोर्ट के मुताबिक, कई कंपनियां छोटे पैक में करीब 2 से 7 फीसदी तक ग्रामेज घटा रही हैं। यानी 10, 20 या 50 रुपये के पैकेट की कीमत पहले जैसी रह सकती है, लेकिन उसमें मिलने वाला सामान कम हो जाएगा। कंपनियों के लिए इन लोकप्रिय कीमतों को बनाए रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि ग्राहक छोटे पैक की कीमत में मामूली बढ़ोतरी को भी तुरंत महसूस करता है।
दूसरी ओर, बड़े पैक में कंपनियों के पास कीमत बढ़ाने की ज्यादा गुंजाइश है। खासकर एक किलो या उससे बड़े पैक में करीब 5 से 6 फीसदी तक कीमत बढ़ने की बात सामने आई है। इससे थोक में खरीदारी करने वाले ग्राहकों का बजट सीधे प्रभावित हो सकता है।
कच्चे माल की बढ़ी लागत बनी वजह
कंपनियों पर पाम ऑयल, पैकेजिंग सामग्री, कच्चे तेल से जुड़े उत्पादों और अन्य जिंसों की बढ़ती कीमतों का दबाव है। बीकाजी फूड्स के अनुसार, पिछले छह-सात महीनों में औसत कच्चे माल की लागत करीब 7 फीसदी बढ़ी है। ऐसे में कंपनियां बढ़ी लागत का बोझ किसी न किसी तरीके से ग्राहकों तक पहुंचा रही हैं।
दूध-घी भी कर सकते हैं जेब ढीली
त्योहारी मौसम में डेयरी उत्पादों की लागत भी चिंता बढ़ा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, दूध की कीमत में करीब तीन रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी का दबाव है। वहीं घी पहले ही करीब 25 से 30 रुपये प्रति किलो महंगा हो चुका है और आगे भी इतनी ही वृद्धि की संभावना जताई गई है। त्योहारों में दूध और घी की खपत बढ़ने से इसका असर घरेलू बजट पर ज्यादा महसूस हो सकता है।
ग्राहक को दो तरफ से झटका
महंगाई का असर सिर्फ एमआरपी बढ़ने से नहीं, बल्कि कम मात्रा मिलने से भी पड़ रहा है। ऐसे में ग्राहक को पैकेट की कीमत वही दिखाई देती है, लेकिन प्रति ग्राम या प्रति किलो वास्तविक लागत बढ़ जाती है। इसलिए खरीदारी करते समय सिर्फ पैकेट की कीमत नहीं, बल्कि उसकी मात्रा और प्रति यूनिट कीमत की तुलना करना ज्यादा जरूरी होगा।


