महाराष्ट्र इस समय गंभीर सूखे की मार झेल रहा है। राज्य के कई इलाकों में बारिश की कमी और जलस्रोतों के तेजी से सूखने का असर खेती पर साफ दिखाई दे रहा है। स्थिति इतनी खराब बताई जा रही है कि किसान 1972 के बाद के सबसे बड़े सूखे जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। कई क्षेत्रों में खरीफ की करीब 80 फीसदी फसलें प्रभावित होने से किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। दूसरी ओर राज्य के जलाशयों में पानी का स्तर भी चिंताजनक रूप से नीचे पहुंच गया है और उपलब्ध जल भंडार करीब 12 फीसदी बताया जा रहा है।
खेतों में खड़ी फसलें सूखीं
महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में बारिश पर निर्भर खेती करने वाले किसानों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण खेतों में खड़ी फसलें समय से पहले सूख गईं। सोयाबीन, कपास, दालों और अन्य खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचा है। जिन किसानों ने उम्मीद के साथ बुआई की थी, अब उनके सामने उत्पादन लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।
कई गांवों में किसान फसल बचाने के लिए उपलब्ध पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन जलस्रोतों में लगातार घटते स्तर के कारण यह कोशिश भी सीमित होती जा रही है। खेतों में नमी खत्म होने और सिंचाई की सुविधा नहीं होने से बड़े क्षेत्र में दोबारा फसल खड़ी करना भी मुश्किल है।
जलाशयों में तेजी से घटा पानी
सूखे का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। राज्य के कई जलाशयों और बांधों में पानी का भंडार तेजी से घटा है। रिपोर्ट के अनुसार जलाशयों में करीब 12 फीसदी पानी ही बचा है। इससे आने वाले दिनों में पेयजल और सिंचाई दोनों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता पहले ही सीमित है। ऐसे में यदि हालात में जल्द सुधार नहीं हुआ तो गांवों में पेयजल संकट गहरा सकता है। प्रशासन के सामने एक साथ किसानों को राहत देने और लोगों के लिए जरूरी पानी उपलब्ध कराने की चुनौती है।
1972 के सूखे की याद क्यों आई?
महाराष्ट्र में 1972 का सूखा राज्य के इतिहास के सबसे गंभीर अकालों में गिना जाता है। उस समय लंबे समय तक बारिश की कमी ने खेती, पशुधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया था। मौजूदा हालात की तुलना उसी दौर से किए जाने की वजह लगातार बारिश की कमी और बड़े पैमाने पर फसल नुकसान है।
हालांकि वर्तमान स्थिति और 1972 के सूखे के बीच सीधी तुलना करते समय क्षेत्रवार बारिश, जल भंडार और सरकारी राहत के आंकड़ों को अलग-अलग देखना जरूरी है। मौजूदा संकट का वास्तविक असर भी अलग-अलग जिलों में अलग है।
किसानों के सामने बढ़ती मुश्किलें
फसल खराब होने के बाद किसानों पर कर्ज और घरेलू खर्च का दबाव बढ़ रहा है। बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी पर खर्च करने के बावजूद अगर खेत से उत्पादन नहीं मिलता, तो अगली फसल के लिए पूंजी जुटाना भी चुनौती बन जाता है। पशुपालकों के लिए चारे और पानी की कमी अलग समस्या है।
किसानों की मांग है कि प्रभावित क्षेत्रों का तत्काल सर्वे कराकर फसल नुकसान के आधार पर राहत दी जाए। इसके साथ ही पेयजल, पशुओं के लिए चारा और अगली बुआई के लिए आर्थिक सहायता की जरूरत बताई जा रही है।
आगे क्या चुनौती?
महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति ने बारिश और जल प्रबंधन को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। आने वाले दिनों में अगर पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो पानी की उपलब्धता और फसल नुकसान दोनों बढ़ सकते हैं। ऐसे में प्रभावित इलाकों में जल संरक्षण, टैंकरों के जरिए पेयजल आपूर्ति, फसल नुकसान का आकलन और किसानों तक राहत पहुंचाना प्रशासन की प्राथमिक चुनौती होगी।
फिलहाल खेतों में सूखती फसलें और घटते जलाशय ग्रामीण महाराष्ट्र की गंभीर स्थिति की तस्वीर पेश कर रहे हैं। किसानों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगली फसल और परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें समय पर कितनी राहत मिल पाती है।


