केंद्र सरकार की ओर से आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बैंक की प्रस्तावित बिक्री पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में बैंक बनाए जाते थे, जबकि मौजूदा सरकार के समय बैंक बेचे जा रहे हैं। राहुल गांधी ने इस सौदे को केवल बैंक के स्वामित्व में बदलाव का मामला नहीं, बल्कि देश की आर्थिक व्यवस्था और रोजगार से जुड़ा मुद्दा बताया है।
राहुल गांधी ने कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल को आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बेचने की योजना पर चिंता जताई। उन्होंने सवाल उठाया कि इस फैसले से बैंक के कर्मचारियों, ग्राहकों और देश की वित्तीय व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा। उनके मुताबिक, सरकारी बैंक आम लोगों, छोटे कारोबारियों और किसानों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में उतरे राहुल गांधी
राहुल गांधी ने 29 अक्टूबर को आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के नाम एक खुला पत्र भी लिखा। इसमें उन्होंने बताया कि मार्च 2025 में बैंक के कुछ कर्मचारी उनसे संसद भवन में मिले थे। कर्मचारियों ने सवाल उठाया था कि जिस बैंक को उन्होंने मेहनत से घाटे से निकालकर मुनाफे में पहुंचाया, उसे सरकार क्यों बेच रही है।
राहुल ने दावा किया कि सात साल पहले आईडीबीआई बैंक घाटे में था, जबकि पिछले वित्त वर्ष में उसने 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा कमाया। उन्होंने इस बदलाव का श्रेय बैंक के कर्मचारियों को दिया।
52,878 करोड़ रुपये में होगी हिस्सेदारी की बिक्री
केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर को आईडीबीआई बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सहायक कंपनी को बेचने की मंजूरी दी थी। इस सौदे का कुल मूल्य 52,878 करोड़ रुपये से अधिक है।
इसमें केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगा। सौदा पूरा होने के बाद केंद्र के पास 15 प्रतिशत और एलआईसी के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बचेगी। इस तरह दोनों की संयुक्त हिस्सेदारी घटकर 34 प्रतिशत रह जाएगी। हालांकि, सौदे को भारतीय रिजर्व बैंक की नियामकीय मंजूरी सहित जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी।
आरक्षण और कर्मचारियों की नौकरी पर क्या चिंता?
राहुल गांधी ने निजीकरण के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका जताई है। उन्होंने कहा कि निजी स्वामित्व आने से कर्मचारियों की सेवा शर्तों और पेंशन संबंधी सुरक्षा भी कमजोर हो सकती है।
दूसरी तरफ, बैंक कर्मचारी संगठन भी इस बिक्री का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने 2 और 3 नवंबर को देशव्यापी भूख हड़ताल का ऐलान किया है। कर्मचारियों की मांग है कि सरकार बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम से कम 51 प्रतिशत बनाए रखे और कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, सेवा शर्तों तथा आरक्षण से जुड़े अधिकारों की लिखित गारंटी दे।
सरकार ने बिक्री प्रक्रिया पर क्या कहा?
बिक्री को लेकर उठ रहे सवालों के बीच वित्त मंत्रालय ने बोली प्रक्रिया का बचाव किया है। सरकार के अनुसार, दूसरी बोली प्रक्रिया अपनाने से सौदे की प्राप्त कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई। सरकार का तर्क है कि निजी निवेश से बैंक में नई पूंजी, तकनीक और बेहतर प्रबंधन व्यवस्था आ सकती है।
इस तरह आईडीबीआई बैंक की बिक्री अब केवल आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक और कर्मचारी हितों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गई है। आने वाले दिनों में सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच बातचीत तथा सौदे की नियामकीय प्रक्रिया पर सबकी नजर रहेगी।


