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भारत की ब्रह्मोस तकनीक को खतरा? इंडोनेशिया के ‘बद्र’ रक्षा समझौते से चिंता

तुर्किये, कतर, पाकिस्तान और इंडोनेशिया द्वारा दोहा में हस्ताक्षरित ‘बद्र’ (Badr) रक्षा समझौते ने कूटनीतिक और सामरिक हलकों में चर्चा छेड़ दी है। इस नए बहुपक्षीय समझौते के बाद भारत में यह चिंता जताई जा रही थी कि क्या इंडोनेशिया के जरिए भारत की बेहद संवेदनशील ब्रह्मोस मिसाइल और अन्य रक्षा तकनीकें पाकिस्तान जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों तक पहुंच सकती हैं? हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों और आधिकारिक बयानों के अनुसार, इन आशंकाओं को लेकर फिलहाल घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।

क्या है ‘बद्र’ समझौता?

कतर की राजधानी दोहा में हुए ‘बद्र’ एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर तुर्किये, कतर, पाकिस्तान और इंडोनेशिया ने हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य रक्षा औद्योगिक सहयोग, सैन्य उत्पादन, तकनीकी प्रशिक्षण और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के क्षेत्र में चारों देशों के बीच तालमेल बढ़ाना है। इसे एक सैन्य गठबंधन की बजाय रक्षा उत्पादन और तकनीकी आदान-प्रदान के काम के बंटवारे की व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।

क्या भारत की ब्रह्मोस तकनीक को है कोई खतरा?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस नए समझौते से भारत और इंडोनेशिया के बीच पहले से तय रक्षा सौदों पर कोई आंच नहीं आने वाली है।

  1. सख्त कानूनी और बौद्धिक संपदा सुरक्षा शर्तें: भारत सरकार द्वारा दूसरे देशों को रक्षा उपकरण बेचने के दौरान कड़े सुरक्षा प्रावधान, डेटा सिक्योरिटी और बौद्धिक संपदा (IPR) से जुड़ी शर्तें तय की जाती हैं। इसके तहत खरीदार देश के लिए बिना अनुमति तकनीक साझा करना संभव नहीं होता।
  2. ओईएम (OEM) की निर्भरता: किसी भी आधुनिक मिसाइल प्रणाली जैसे कि ब्रह्मोस या अस्त्र के संचालन, रखरखाव, मरम्मत और उसकी लाइफ-एक्सटेंशन (अवधि बढ़ाने) के लिए हमेशा मूल उपकरण निर्माता (OEM यानी भारत) की तकनीकी सहायता की आवश्यकता बनी रहती है। केवल मिसाइल खरीद लेने से उसकी पूरी तकनीक या ब्लूप्रिंट दूसरे देशों को ट्रांसफर नहीं हो जाते।
  3. रणनीतिक व्यापार हित: इंडोनेशिया और भारत के बीच रक्षा सौदे आपसी विश्वास और सामरिक प्राथमिकताओं पर आधारित हैं। ऐसे में भारत को अपनी रक्षा कूटनीति के तहत सतर्क रहने की जरूरत तो है, लेकिन इस नए क्षेत्रीय समझौते से भारत की रणनीतिक बढ़त या तकनीक सुरक्षा को कोई सीधा खतरा नहीं है।

MoU सिर्फ इरादा है, गठबंधन नहीं

सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज के सीनियर फेलो ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत (रिटायर्ड) ने भी कहा कि MoU को सैन्य गठबंधन समझना गलत है।

अहलावत के अनुसार, बद्र MoU की भाषा से लगता है कि यह साझा इस्लामी पहचान वाले देशों के बीच रक्षा R&D में तालमेल और काम के बंटवारे की व्यवस्था है। इससे पहले अगस्त में मक्का में भी ऐसा ही समझौता हुआ था। सिर्फ एक MoU के आधार पर भारत के पहले से तय रक्षा निर्यात सौदे को खतरे में मानना सही नहीं होगा।

उन्होंने कहा, “हथियार बेचने का मतलब यह नहीं कि आपने उसकी पूरी तकनीक भी बेच दी, जिससे वह देश खुद मिसाइल बना सके।”

भारत को क्या करना चाहिए?

फिलहाल भारत को इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए रखनी चाहिए। यह देखना अहम होगा कि चारों देशों के बीच रक्षा अनुसंधान और उत्पादन का सहयोग किस स्तर तक जाता है। लेकिन केवल बद्र MoU के आधार पर भारत के रक्षा सौदों या उसकी मिसाइल तकनीक की सुरक्षा को लेकर खतरा मानना जल्दबाजी होगी। एक्सपर्ट्स की राय में ब्रह्मोस की तकनीक पूरी तरह सुरक्षित है और दोस्त के जरिये दुश्मन तक नहीं पहुंचेगी।

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