देश में पुरानी है फिल्मो पर प्रतिबन्ध की पॉलिटिक्स , इंदिरा गाँधी से मोदी सरकार तक , जाने कब – कब लगा बैन ?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हालही में बीबीसी द्वारा एक डॉक्यूमेंट्री रिलीज की गई जिसपर विवाद खड़ा हो गया।इस डॉक्यूमेंट्री को लेकर ब्रिटेन की संसद से लेकर भारत की सड़को तक बवाल मचा हुआ है। केंद्र सरकार ने डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग पर देश में बैन लगा दिया है। हालाँकि यह पहला मौका नहीं है जब देश में किसी डॉक्यूमेंट्री या फिल्म पर पोलिटिकल बैन का कोड़ा चला है।इंदिरा गाँधी से लेकर मोदी सरकार तक पहले भी कई दफा परदे में उतरने से पहले ही फिल्मे पोलिटिकल बैन की भेंट चढ़ चुकी है। इस रिपोर्ट में आप उन बड़ी फिल्मो के बारे में पढ़ेंगे जिन पर देश की सरकार द्वारा बैन लगाया गया है।इस लिस्ट में उन फिल्मो को शामिल किया गया है जो देश के राजनेताओ की जीवन के इर्द गिर्द तैयार की गई थी।

  1. आंधी (1975) इंदिरा गांधी सरकार द्वारा बैन

आंधी फिल्म 1975 में रिलीज हुई थी.यह वो दौर था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया था।फिल्म में मुख्य नायिका के रूप में सुचित्रा सेन थी। ऐसे कहा गया कि फिल्म में इंदिरा गांधी के साथ उनकी विशिष्ट समानताएं थीं, विशिष्ट साड़ियों से लेकर चांदी की लकीर वाले गेट-अप तक और तेज चलने की शैली से लेकर भाषण देने तक, सभी तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के समान थे।इसके अलावा फिल्म की अदाकारा के धूम्रपान और शराब पीने के दृश्यों ने आग में घी डाला था। जिसके परिणामस्वरूप फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

जब इंदिरा गांधी सत्ता में थीं तब फिल्म को पूरी तरह से उचित तरीके से रिलीज नहीं होने दिया गया था। 1975 के राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान रिलीज होने के कुछ महीनों बाद ही फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के कथित आधार पर इस फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.तब यह दावा करते हुए कि इससे कांग्रेस पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है। इसलिए चुनाव आयोग ने फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी।

तब फिल्म पर लगे बैन ने तुरंत फिल्म को एक राष्ट्रीय विषय बना दिया। हालाँकि 1977 के राष्ट्रीय चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद, सत्तारूढ़ जनता पार्टी ने इसे मंजूरी दे दी और राज्य द्वारा संचालित टेलीविजन चैनल पर इसका प्रीमियर किया। यह फिल्म सुचित्र सेन के करियर की एक महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई, और उनकी आखिरी हिंदी फिल्म भी.उन्होंने 1978 में फिल्मों से पूरी तरह से संन्यास ले लिया था।

2 . किस्सा कुर्सी का (1977) इंदिरा और संजय गांधी पर एक व्यंग्य

किस्सा कुर्सी का फिल्म अमृत नाहटा द्वारा निर्देशित 1977 की भारतीय हिंदी भाषा की राजनीतिक व्यंग्य फिल्म है। यह फिल्म सांसद बद्री प्रसाद जोशी द्वारा निर्मित थी। यह फिल्म इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी की राजनीति पर व्यंग्य थी.आपातकाल के दौरान इंदिरा सरकार द्वारा इसे भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। और सभी प्रिंट जब्त कर लिए गए थे।

तब फिल्म के एक डायलॉग “सर, इस नौजवान को छोटी कार बनाने का लाइसेंस दे दो क्योंकि उसने इसे अपनी मां के गर्भ में सीखा था” जैसे संवादों ने जमकर चर्चा लूटी थी। हालाँकि, शबाना आज़मी और राज बब्बर अभिनीत फिल्म दिन के उजाले को नहीं देख सकी क्योंकि तत्कालीन कांग्रेस शासित सरकार ने आपातकाल के दौरान फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया था और सभी प्रिंट जब्त कर लिए गए थे।

3 – कौम दे हीरे (2014 )

यह फिल्म इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले सतवंत सिंह, बेअंत सिंह और केहर सिंह के जीवन पर आधारित थी जो 2014 की भारतीय पंजाबी भाषा की फिल्म है।केंद्र मोदी सरकार ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के बाद चेतावनी दी थी कि फिल्म सांप्रदायिक तनाव का कारण बन सकती है। इस फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों को महिमामंडित किया गया था।ऐसे में इस फिल्म पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। हालाँकि बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने बैन हटाने के निर्देश दिए थे।

गोकुल शंकर – 1963

कांग्रेस सरकार द्वार महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं को चित्रित करने के लिए इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था।

कुत्रपथिरिकै (1993 )

यह फिल्म 1993 में बनकर तैयार हुई थी। चूंकि इसमें पृष्ठभूमि के रूप में राजीव गांधी की हत्या थी, यह 2007 तक रिलीज नहीं हुई थी।

पैपिलियो बुद्ध (2013 )

इस फिल्म प्रारंभ में महात्मा गांधी की आलोचना के कारण इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। गांधी विरोधी भाषणों को म्यूट और/या ब्लर करने के बाद इसे रिलीज की अनुमति दी गई थी।

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