उम्मीदवार के पास सिर्फ ज्यादा विधायक और सांसद होने से नहीं मिलती जीत ,बहुत पेचीदा है राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया , समझिये यहाँ पूरा समीकरण

देश में राष्ट्रपति चुनाव के लिए अब कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। 18 जुलाई को देश में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान होंगे वहीँ 21 जुलाई को परिणाम सामने आएंगे और देश को नया राष्ट्रपति मिल जायेगा। राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में यूं तो कई प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल किया है लेकिन जिन दो नामो के बीच असल मुकाबला होना है उनमे सत्ताधारी एनडीए की ओर से द्रोपदी मुर्मू और विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा हैं।देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा इसका फैसला तो नतीजों के बाद ही पता चलेगा लेकिन इससे पहले आइये समझते हैं आखिर देश में कैसे होता है राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव।

देश में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के लिए चुनाव के लिए तो सीधा जनता ही वोट करती है लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में जनता नहीं बल्कि जनता के प्रतिनिधि यानि की सांसद और विधायक वोट करेंगे। इसी लिए राष्ट्रपति चुनाव को अप्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। बाकी चुनावों की तरह ही भारत में राष्ट्रपति चुनाव इलेक्शन कमीशन के निर्देशन में होता है ।

कौन – कौन कर सकता है राष्ट्रपति चुनाव में मतदान

देश में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे आम जनता के वोटों से तय नहीं होता । बल्कि जनता जिनको चुनती है उनके वोटों से राष्ट्रपति का चुनाव होता है । इसीलिए इसको अप्रत्यक्ष निर्वाचन कहते हैं । इस तरह राष्ट्रपति चुनाव में सांसद और विधायक ही वोट डाल सकते हैं जबकि विधानपरिषद और राज्यसभा के नामित सदस्य वोट नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें जनता सीधे नहीं चुनती है।

वोटर तय करता है प्राथमिकता

राष्ट्रपति चुनाव में एक विशेष तरीके से वोटिंग होती है , जिसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम कहते हैं । इसमें वोटर एक ही वोट देता है , लेकिन वह तमाम प्रत्याशियों में से अपनी प्राथमिकता या पसंद तय कर देता है । यानी वह बैलट पेपर पर बता देता है कि उसकी पहली पसंद और दूसरी पसंद कौन है । यदि पहली पसंद वाले वोटों से विजेता का फैसला नहीं होता है तो फिर उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसंद को नए सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है । इसलिए इसे सिंगल ट्रांसफरेबल वोट कहा जाता है ।

सांसदों और विधायकों के वोट का होता है अलग भार

राष्ट्रपति चुनाव में वोट डालने वाले सांसदों और विधायकों के मतदान का वेटेज अलग – अलग होता है । वहीँ दो राज्यों के विधायकों के वोटों का वेटेज भी अलग होता है । यह वेटेज जिस तरह तय किया जाता है , उसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था कहते हैं । फिलहाल में देश के राज्यों के सभी विधायकों के वोट का वैल्यू 5 लाख 43 हजार 231 है । वहीं लोकसभा के सांसदों का कुल वैल्यू 5 लाख 43 हजार 200 है ।

इस तरह तय होता है वेटेज

राष्ट्रपति चुनाव के लिए वेटेज तय करना के लिए भी एक अलग प्रक्रिया होती है। इसमें विधायक के वोट का वेटेज विधायक के मामले में जिस राज्य का विधायक हो उसकी आबादी देखी जाती है । इसके साथ उस प्रदेश के विधानसभा सदस्यों की संख्या को भी ध्यान में रखा जाता है । वेटेज निकालने के लिए प्रदेश की जनसँख्या को चुने गए विधायकों की संख्या से भाग किया जाता है । इस तरह जो आंकड़ा मिलता है उसे फिर 1000 से भाग किया जाता है ।इसके बाद जो भी आंकड़ा निकलकर आता है वही उस राज्य के एक विधायक के वोट का वेटेज होता है ।वहीँ 1000 से भाग देने पर अगर शेष 500 से ज्यादा हो तो वेटेज में 1 जोड़ दिया जाता है।

विधायक और सांसद के वेटेज का अलग है समीकरण

सबसे पहले सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुने हुए सदस्यों के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है । अब इस सामूहिक वेटेज को राज्यसभा और लोकसभा के चुने हुए सदस्यों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है । इस तरह जो आंकड़ा मिलता है , वह एक सांसद के वोट का वेटेज होता है । अगर इस तरह भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा बचता हो तो वेटेज में 1 का इजाफा हो जाता है ।

वोटों की गिनती राष्ट्रपति के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट हासिल करने से ही जीत तय नहीं होती है । प्रेजिडेंट वही बनता है जो वोटरों यानी सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल वेटेज का आधा से ज्यादा हिस्सा हासिल करे । यानी इस चुनाव में पहले से तय होता है कि जीतने वाले को कितना वोट यानी वेटेज पाना होगा । इस समय राष्ट्रपति चुनाव के लिए जो इलेक्टोरल कॉलेज है उसके सदस्यों के वोटों का कुल वेटेज 10,98,882 है । इस तरह जीत के लिए उम्मीदवार को होंगे 5,49,442 वोट प्राप्त करने होंगे ।

प्रायॉरिटी का महत्व इस सबसे पहले का मतलब समझने के लिए वोट काउंटिंग में प्रायोरिटी पर गौर करना होगा । सांसद या विधायक वोट देते वक्त अपने मतपत्र पर बता देते हैं कि उनकी पहली पसंद वाला कैंडिडेट कौन है , दूसरी पसंद वाला कौन और तीसरी पसंद वाला कौन आदि आदि । सबसे पहले सभी मतपत्रों पर दर्ज पहली वरीयता के मत गिने जाते हैं । यदि इस पहली गिनती में ही कोई कैंडिडेट जीत के लिए जरूरी वेटेज का कोटा हासिल कर ले , तो उसकी जीत हो गई ।

लेकिन अगर ऐसा न हो सका , तो फिर एक और कदम उठाया जाता है ।उस प्रत्याशी को रेस से बाहर किया जाता है जिसे पहली गिनती में सबसे कम मतदान मिले । लेकिन उसको मिले वोटों में से यह देखा जाता है कि उनकी दूसरी पसंद के कितने वोट किस उम्मीदवार को मिले हैं । फिर सिर्फ दूसरी पसंद के ये वोट बचे हुए उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर किए जाते हैं । यदि ये वोट मिल जाने से किसी उम्मीदवार के कुल वोट तय संख्या तक पहुंच गए तो वह उम्मीदवार जीता हुआ माना जाएगा । नहीं तो दूसरे दौर में सबसे कम वोट पाने वाला रेस से बाहर हो जाएगा और यह प्रक्रिया फिर से दोहराई जाएगी ।

इस तरह वोटर का सिंगल वोट ही ट्रांसफर होता है । यानी ऐसे वोटिंग सिस्टम में कोई बहुमत ग्रुप अपने दम पर जीत का फैसला नहीं कर सकता है । छोटे – छोटे दूसरे गुट भी पांसा पलट सकते हैं। इस तरह देखा जाए तो जरूरी नहीं कि लोकसभा और राज्यसभा में जिस पार्टी का बहुमत हो उसी को जीत मिले विधायकों की भूमिका भी निर्णायक होती है ।

जीत की दौड़ से कैसे होता है प्रत्याशी बाहर

चुनाव में दूसरी पसंद के वोट ट्रांसफर होने के बाद सबसे कम वोट वाले प्रत्याशी को बाहर करने की नौबत आने पर अगर दो प्रत्याशियो को सबसे कम वोट मिले हों तो बाहर उसे किया जाता है , जिसके फर्स्ट प्रायॉरिटी वाले वोट कम हों । अगर आखिर तक किसी प्रत्याशी को तय कोटा न मिले ,तो भी इस प्रक्रिया में प्रत्याशी बारी – बारी से दौड़ से बाहर होते रहते हैं और आखिर में बचने वाले प्रत्याशी को विजेता ऐलान कर दिया जाता है।

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