कर्नाटक के हिजाब बैन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित ,अदालत में रखी गई ये दलीलें

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के हिजाब बैन मामले पर सुनवाई के बाद अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट कभी भी अपने फैसले को सुना सकता है।10 दिन तक चली सुनवाई के दौरान जस्टिस हेमंत गुप्ता और सुधांशु धूलिया की बेंच ने हिजाब समर्थक याचिकाकर्ताओं के साथ कर्नाटक सरकार और कॉलेज शिक्षकों की भी दलीलों को सुना जिसमे हिजाब समर्थकों की दलील जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद पर केंद्रित रही वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार ने स्कूल – कॉलेज में अनुशासन के बिंदु पर मुख्य बहस की।

सुनवाई के शुरुआती साढ़े 7 दिन हिजाब समर्थक याचिकाकर्ताओं की तरफ से कई वरिष्ठ वकीलों ने दलीलें राखी। उसके बाद डेढ़ दिन कर्नाटक सरकार और कॉलेज शिक्षकों ने अपना पक्ष अदालत में रखा। सुनवाई के अंतिम दिन याचिकाकर्ताओं को एक बार फिर मौका मिला कि वह राज्य सरकार की दलीलों का जवाब दे सके। इस दौरान वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे , सलमान खुर्शीद , हुजैफा अहमदी , देवदत्त कामत और संजय हेगड़े ने जजों को इस बात से आश्वस्त करने की कोशिश कि कर्नाटक के स्कूल – कॉलेजों में हिजाब पहनने से मुस्लिम छात्राओं को रोका जाना गलत है।

दुष्यंत दवे ने राज्य सरकार की तरफ से मामले में विवादित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई का नाम लिए जाने पर आपत्ति जताई। दवे ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने बिना किसी आधार के पीएफआई को इस विवाद के लिए जिम्मेदार बता दिया , जबकि मामले से उसका कोई लेना देना नहीं है। इस पर वरिष्ठ मंत्री सलमान खुर्शीद ने कोर्ट को बताया कि तीन तलाक मामले में उन्होंने खुद एमिकस क्यूरी की हैसियत से कोर्ट की सहायता की और यह दलील दी थी कि तीन तलाक इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है . अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान यह माना गया कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है . लेकिन महिलाओं के पर्दा करने का जिक्र कुरान में है . अगर कुछ मुस्लिम लड़की हिजाब पहनना चाहती हैं , तो उन्हें नहीं रोका जाना चाहिए।

वरिष्ठ वकीलों हुजैफा अहमदी , देवदत कामत और संजय हेगडे ने दलील दी कि हिजाब धर्म का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं , इस पर चर्चा जरूरी नहीं है। अगर इसे एक धार्मिक फ़र्ज़ की तरह मानते हुए लड़कियां यूनिफॉर्म के रंग का हिजाब अपने सर पर रखती हैं , तो इससे किसी भी दूसरे छात्र का कोई अधिकार प्रभावित नहीं होता है . इसलिए , रोक लगाने का आदेश गलत है।

अदालत में राज्य सरकार की तरफ से दी गई ये दलील

इससे पहले राज्य सरकार की तरफ से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता , कर्नाटक के एडवोकेट जनरल प्रभूलिंग के नवाडगी और एडीशनल सॉलीसीटर जनरल के . एम . नटराज ने बहस की थी। उन्होंने कहा था कि 2021 तक सभी छात्र यूनिफार्म का पालन कर रहे थे ,2022 में हिजाब को लेकर अभियान चलाया गया। जब मुस्लिम लड़कियों ने हिजाब पहनकर स्कूल आना शुरू किया तो जवाब में हिंदू छात्र भगवा गमछा पहन कर आने लगे। सरकार ने स्कूलों में अनुशासन कायम करने के लिए यूनिफॉर्म के पालन का आदेश दिया . सरकार ने यह भी कहा कि यूनिफार्म शिक्षण संस्थान तय करते हैं , राज्य सरकार नहीं . इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है । किसी भी कपड़े को पहनने पर राज्य सरकार ने रोक लगाई , सरकार सिर्फ यही चाहती है कि छात्रों के बीच एकता और सद्भावना का रहे और स्कूलों में अनुशासित माहौल में पढ़ाई हो सके।

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