चुनावी हार से शुरुआत कर हिन्दू हृदय सम्राट तक जानिए कैसे कल्याण सिंह ने तय किया अपना सियासी सफर

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपना देह त्याग कर परम् धाम की ओर गंतव्य कर चुके हैं। शनिवार रात लगभग 9 बजे भाजपा और भारतीय राजनीती के इस कद्दावर नेता ने अपनी अंतिम साँसे ली। वे लम्बे समय से बीमारी से जूझ रहे थे और इसी बीमारी के उन्होंने संसार त्याग दिया। पूरे देश में न सिर्फ सियासी जगत बल्कि हर वह शख्स कल्याण सिंह की जाने से स्तब्ध है शोक विलीन है जो बाबूजी के व्यक्तित्व से परिचित था। बाबूजी…कलयाण सिंह अपने चाहने वालो और समर्थको के बीच बाबूजी के नाम से पुकारे जाते थे। कल्याण सिंह के जीवन का इस भौतिक जगत का सफर तो थम गया लेकिन उनकी यादे हिन्दुस्तान की सियासत में सदा सफर करती रहेंगी।

चुनावी हार से हिंदी सम्राट तक का सफरनामा

कल्याण सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ के अतरौली में 5 जनवरी 1932 को हुआ था। शिक्षा के क्षेत्र में बीए तक पढाई करने के बाद कल्याण सिंह खुद को सियासी गलियारों में कदम रखने से नहीं रोक पाए। कल्याण सिंह ने अपने राजनितिक जीवन की शुरआत जनसंघ से की। साल 1952 में कल्याण सिंह जनसंघ में शामिल हो गए। कल्याण सिंह के विषय में कहा जाता है की वे अपने स्कूलों दिनों से ही संघ में सम्मिलित हो गए थे। और संघ के बाद ही उन्होंने जनसघ ज्वाइन की। लकिन हर बड़े नेता की तरह कल्याण सिंह के राजनितिक सफर की शुरआत जीत के साथ नहीं बल्कि चुनाव में मिली हार के साथ हुई थी।

साल 1962 में कल्याण सिंह महज 30 वर्ष की उम्र में पहला चुनाव लड़ने उतर गए। कल्याण सिंह ने पहला चुनाव अतरौली से लड़ा लेकिन सियासी सफर के पहले ही चुनाव में कल्याण सिंह को हार का मुँह देखना पड़ा। सोशलिस्ट पार्टी के बाबू सिंह ने उन्हें चुनाव में हरा दिया। लेकिन कल्याण सिंह उन मौसमी नेताओ में से नहीं थे जो हार के बाद शांत बैठ जाते और बरसाती मेंढक की तरह अगले चुनाव में फिर निकल आते। हार के बाद कल्याण सिंह ने अतरौली में जी तोड़ मेहनत की जनता से सरोकार बढ़ाया ,आमजन की समस्या को हल कराया और अगले 5 साल तक कल्याण सिंह पूरी तरह अतरौली में सक्रीय रहे और अगले विधानसभा चुनावो में कांग्रेस के बाबू सिंह को ही 5 हजार से ज्यादा मतों से करारी शिकस्त दी और 35 साल की उम्र में कल्याण सिंह पहली बार विधायक बने।

कल्याण सिंह 1967 में अतरौली से विधायक बनने के बाद नहीं रुके सूबे की सियासत में भी वे सक्रीय नजर आने लगे 1967 से 1980 कल्याण सिंह लगातार विधायक रहे 1977 में कल्याण सिंह को मंत्री पद की जिम्मेदारी से भी नवाजा गया तब जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो चूका था रामनरेश यादव की सरकार में कल्याण सिंह को स्वस्थ मंत्री बनाया गया। लेकिन पार्टी के बिखर जाने के चलते 1980 के विधानसभा चुनावो में कल्याण सिंह की चुनावी जीत का रथ रुक गया और कांग्रेस के अनवर खान ने कल्याण सिंह को चुनाव में हरा दिया।

1980 में तभी भारतीय जनता पार्टी सामने आयी 6 अप्रैल 1980 को भाजपा का गठन हुआ और कल्याण सिंह को प्रदेश महामंत्री बनाकर भाजपा की जिम्मेदारी सौंप दी गयी। और 1985 के विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह एक बार फिर भाजपा की टिकट से उतरे और अपनी चुनावी जीत के सिलसिले को एक बार फिर हासिल किया।यह वो दौर था जब देश में राममंदिर का मुद्दा धीरे धीरे उभर कर देश और सूबे की सियासत में अपने पाँव पसार रहा था। उत्तर प्रदेश में राममंदिर आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी और रामंदिर के इस आंदोलन में कल्याण सिंह तबके मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के खिलाफ कूद चुके थे। कल्याण सिंह ने राममंदिर आंदोलन में गिरफ़्तारी दी और धीरे धीरे कलयाण सिंह भाजपा में हिन्दू चेहरा बनकर उभरने लगे। 1985 से 2004 तक कल्याण सिंह विधायक रहे। कल्याण सिंह 2 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने। इसी बीच कल्याण सिंह के जीवन का वो दौर भी आया जिसने भारतीय सियासत में कल्याण सिंह को सदा के लिए हिन्दू हृदय सम्राट के रूप में समाहित कर दिया।

6 दिसंबर 1992 का वो दिन और कल्याण सिंह ……

1991 में उत्तर प्रदेश में राममंदिर आंदोलन के सहारे भाजपा की सरकार बन चुकी थी ,उत्तर प्रदेश में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में कल्याण सिंह जिम्मेदारी संभल रहे थे। सूबे में सब कुछ जैसा चलना चाहिए वैसा चल रहा था लेकिन धोरे धोरे राममंदिर आंदोलन जोरो से बढ़ता जा रहा था तभी 6 दिसंबर 1992 का वो दिन आया जिसने कल्याण सिंह के जीवन को हिदुस्तान की सियासत और हिन्दुओ के हृदय में अमित छाप के रूप में छोड़ दी।

दिसबंर 6 साल 1992 का वो दिन घडी पर लगभग दोपहर के 1 बज रहे थे कल्याण सिंह अपने निवास 5 कालिदास मार्ग पर घर में बैठे हुए थे। साथ में उनके राज्य के कुछ मंत्री भी थे। कल्याण सिंह सूबे में चल रही हलचल पर टीवी के जरिये नजर बनाये हुए थे। तभी सबने देखा की कार सेवक अचानक कार सेवक बाबरी के विवादित ढाँचे पर चढ़ गए और उसे तोड़ने लगे। हजारो की संख्या में कार सेवक ढांचे पर चढ़ने लगे और तोड़ने लगे। पुलिस महानिदेशक कल्याण सिंह के पास पहुंचे और कार सेवको पर गोली चलने के आदेश मांगने लगे लेकिन कलयाण सिंह ने गोली चलाने की इजाजत देने से इंकार कर दिया और कहा की दुसरे तरीको से आप स्थति को नियंत्रण करने का प्रयास करें। मुख्यमंत्री की यह बात सुनकर पुलिस महानिदेशक वापस लौट गए। कल्याण सिंह टीवी पर हालात देख रहे थे और तभी जैसे ही ढांचे की आखिरी ईंट गिरी कलयाण सिंह ने टेबल पर रखा अपना नोट पेड उठाया और पेन उठाकर खुद से अपना इस्तीफा लिख दिया। पूरे हालातो की जिम्मेदारी कल्याण सिंह ने खुद ली और सीधा इस्तीफा लेकर राज्यपाल के पास मुस्कुराते हुए पहुँच गए.और राज्यपाल को अपना लिखित इस्तीफा सौंपा और सहयोग के लिए धनयवाद दिया। इस्तीफे में लिखा हुआ था मैं मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे रहा हूँ कृपया स्वीकार कीजिये। और इस तरह कल्याण सिंह ने राममंदिर के लिए अपनी सियासत दांव पर लगा दी और पल भर में मुख्यमंत्री की कुर्सी त्याग दी। और सीएम की कुर्सी त्यागते ही कल्याण सिंह हिन्दुओ के हृदय में सदा के लिए सम्राट बनकर बस गए।

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