कभी 19 साल की उम्र में यह शख्स हारा था निर्दलीय चुनाव आज है भारत की सियासत का चमकता सितारा

चुनावी मैदान में मिली जीत ने न जाने कितने ही लोगों की जिंदगी की तकदीर बदली होगी लेकिन इसी चुनावी मैदान में आज से 30 साल पहले एक शख्स को ऐसी हार मिली थी जिस हार ने ना केवल उस शख्स की पूरी जिंदगी बदल कर रख दी बल्कि वही शख्स आज भारत की सियासी तकदीर के नए आयाम गढ़ रहा है ।इस रिपोर्ट में आप जानेंगे आखिर कौन है वो शख्स और कैसे एक एक हार ने उसकी जिंदगी बदली।

हम बात कर रहे हैं भारत के सबसे बड़े सूबे यानी कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री भाजपा के प्रखर हिंदूवादी नेता योगी आदित्यनाथ की। ना केवल उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे देश में योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता किसी से भी नहीं छुपी है। लेकिन क्या आप जानते हैं अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत योगी आदित्यनाथ ने एक हार के साथ की थी और कहा जाता है इसी हार के बाद योगी आदित्यनाथ के जीवन मे सबसे बड़ा बदलाव सामने आया।

19 साल की उम्र में छात्रसंघ चुनाव में मिली थी करारी हार

आज के योगी आदित्यनाथ तब अजय बिष्ट के नाम से जाने जाते थे शुरुआती जीवन से ही योगी आदित्यनाथ तेजतर्रार छवि वाले व्यक्ति के थे। यह वक्त था 1991 का तब 19 वर्षीय योगी आदित्यनाथ गढ़वाल यूनिवर्सिटी में गणित से बीएससी की पढ़ाई कर रहे थे तभी उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से छात्र संघ के चुनाव लड़ने का निर्णय लिया लेकिन एबीवीपी के द्वारा उन्हें टिकट नहीं दी गई। लेकिन टिकट ना मिलने के बावजूद योगी आदित्यनाथ ने चुनाव लड़ने का फैसला नही छोड़ा और वे निर्दलीय प्रत्यासी के रूप में ही मैदान में उतर गए लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया औऱ योगी आदित्यनाथ को चुनाव में करारी हार मिली और वे पांचवें नंबर पर रहे।

हार से निराश होकर किया गोरखपुर जाने का फैसला

छात्र संघ चुनाव में मिली करारी हार का असर योगी आदित्यनाथ पर जमकर हुआ कहा जाता है कि हार से वे पूरी तरह निराश हो गए और दुखी होकर अपने मामा और गोरखनाथ मठ के मुखिया महंत अवैद्यनाथ को चिट्ठी लिखी जिसमें उन्होंने कहा कि मुझे गोरखपुर बुला लो और वे गोरखपुर चले गए। जहां 1993 में 21 साल की उम्र में उन्होंने परिवार का त्याग कर दिया और गोरखपुर मठ के महंत अवैद्यनाथ को अपना धर्म पिता स्वीकार कर लिया। जहां 1994 में महंत अवैद्यनाथ ने आदित्यनाथ को अपने उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त किया जिसके बाद 1998 तक आदित्यनाथ ने गोरखनाथ मठ में ही धार्मिक शिक्षा प्राप्त की।कहा जाता है छात्रसंघ में मिली हार ही वह कारण था जिसके चलते योगी आदित्यनाथ ने सांस्कारिक जीवन का त्याग कर दिया था।

संत से सियासत तक का सफर

योगी आदित्यनाथ ने अपने सांसारिक जीवन का त्याग तो कर दिया लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था 1998 में उनके गुरु अवैध नाथ ने राजनीति से संयास ले लिया योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया बस यही से योगी आदित्यनाथ सियासी सफर शुरू हो गया 1998 में 12 वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर सबसे कम उम्र के सांसद बने। इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने कभी भी हार का मुंह नहीं देखा लगातार पांच बार उन्होंने लोकसभा चुनाव जीता साल 2017 में भारत के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की।यही नही भाजपा में आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद योगी आदित्यनाथ ही प्रधानमंत्री के सबसे बड़े चेहरे के रूप में देखे जा रहे हैं।

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